Sunday, 24 March 2013
आदमी और दैत्य
आदमी और दैत्य
एक बार एक आदमी घने जंगल में रास्ता भटक गया. यहाँ-वहां रास्ता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उसे बहुत रात हो गई. सर्दी कामहीना था और वह भूखा-प्यासा ठण्ड के मारे ठिठुरता हुआ अँधेरे में ठोकरें खाता रहा.
कहीं दूर उसे रौशनी दिखाई दी और वह उस और यह सोचकर चल दिया कि शायद वह किसी लकड़हारे की झोपड़ी होगी.
रौशनी एक गुफा के भीतर से आ रही थी. वह आदमी गुफा के भीतर घुस गया और उसने यह देखा कि वह एक दैत्य की गुफा थी.
“मैं इस जंगल में रास्ताभटक गया हूँ और बहुत थका हुआ हूँ” – आदमी ने दैत्यसे कहा – “क्या मैं आपकी गुफा में रात भर के लिए ठहर सकता हूँ?”
“आओ और यहाँ आग के पास बैठ जाओ” – दैत्य ने कहा.
आदमी आग के पास जाकर बैठ गया. उसकी उँगलियाँ ठण्ड से ठिठुर रही थीं. वह अपनी उँगलियों पर अपने मुंह से गर्म हवा फूंककर उन्हें गर्मानेलगा.
“तुम अपनी उँगलियों पर क्यों फूंक रहे हो?” – दैत्य ने पूछा.
“क्योंकि मेरी उँगलियाँ बहुत ठंडी हैं इसलिए मैं फूंक मारकर उन्हें गर्म कर रहा हूँ” – आदमी ने जवाब दिया.
“क्या इससे वे गर्म हो जायेंगीं? – दैत्य ने पूछा.
“हाँ. हम मनुष्य लोग ऐसा ही करते हैं” – आदमी ने जवाब दिया.दैत्य ने कुछ नहीं कहा. कुछ
देर बाद वह गुफा के भीतर
गया और आदमी के लिए
कटोरे में खाने की कोई
चीज़ ले आया.
खाना इतना गर्म
था कि आदमी उसे
खा नहीं सकता था. वह
कटोरे में फूंक मारकर उसे
ठंडा करने लगा.
“क्या खाना ठंडा है?” –
दैत्य ने पूछा.
“नहीं. खाना तो बहुत
गरम है” – आदमी ने जवाब
दिया.
“तो तुम इसमें फूंक क्यों रहे
हो?” – दैत्य ने पूछा.
“इसे ठंडा करने के लिए” –
आदमी ने जवाब दिया.
“फ़ौरन मेरी गुफा से
निकल जाओ!” – दैत्य
आदमी पर चिल्लाया –
“मुझे तुमसे डर लग रहा है.
तुम एक ही फूंक से गर्म और
ठंडा कर सकते हो!”
Saturday, 23 March 2013
चाणक्य
एक समय की बात है। चाणक्य अपमान भुला नहीं पा रहे थे। शिखा की खुली गांठ हर पल एहसास कराती कि धनानंद के राज्य को शीघ्राति शीघ्र नष्ट करना है। चंद्रगुप्त के रूप में एक ऐसा होनहार शिष्य उन्हें मिला था जिसको उन्होंने बचपन से ही मनोयोग पूर्वक तैयार किया था। एक समय की बात है। चाणक्य अपमान भुला नहीं पा रहे थे। शिखा की खुली गांठ हर पल एहसास कराती कि धनानंद के राज्य को शीघ्राति शीघ्र नष्ट करना है। चंद्रगुप्त के रूप में एक ऐसा होनहार शिष्य उन्हें मिला था जिसको उन्होंने बचपन से ही मनोयोग पूर्वक तैयार किया था।
अगर चाणक्य प्रकांड विद्वान थे तो चंद्रगुप्त भी असाधारण और अद्भुत शिष्य था। चाणक्य बदले की आग से इतना भर चुके थे कि उनका विवेक भी कई बार ठीक से काम नहीं करता था।
अगर चाणक्य प्रकांड विद्वान थे तो चंद्रगुप्त भी असाधारण और अद्भुत शिष्य था। चाणक्य बदले की आग से इतना भर चुके थे कि उनका विवेक भी कई बार ठीक से काम नहीं करता था।
चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घोड़ों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का ठीक आकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।
चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घोड़ों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का ठीक आकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।
चंद्रगुप्त बड़ी मुश्किल से जान बचाने में सफल हुए। चाणक्य भी एक घर में आकर छुप गए। वह रसोई के साथ ही कुछ मन अनाज रखने के लिए बने मिट्टी के निर्माण के पीछे छुपकर खड़े थे। पास ही चौके में एक दादी अपने पोते को खाना खिला रही थी।
चंद्रगुप्त बड़ी मुश्किल से जान बचाने में सफल हुए। चाणक्य भी एक घर में आकर छुप गए। वह रसोई के साथ ही कुछ मन अनाज रखने के लिए बने मिट्टी के निर्माण के पीछे छुपकर खड़े थे। पास ही चौके में एक दादी अपने पोते को खाना खिला रही थी।
दादी ने उस रोज खिचड़ी बनाई थी। खिचड़ी गरमा-गरम थी। दादी ने खिचड़ी के बीच में छेद करके गरमा-गरम घी भी डाल दिया था और घड़े से पानी भरने गई थी। थोड़ी ही देर के बाद बच्चा जोर से चिल्ला रहा था और कह रहा था- जल गया, जल गया।
दादी ने उस रोज खिचड़ी बनाई थी। खिचड़ी गरमा-गरम थी। दादी ने खिचड़ी के बीच में छेद करके गरमा-गरम घी भी डाल दिया था और घड़े से पानी भरने गई थी। थोड़ी ही देर के बाद बच्चा जोर से चिल्ला रहा था और कह रहा था- जल गया, जल गया।
दादी ने आकर देखा तो पाया कि बच्चे ने गरमा-गरम खिचड़ी के बीच में अंगुलियां डाल दी थीं।
दादी ने आकर देखा तो पाया कि बच्चे ने गरमा-गरम खिचड़ी के बीच में अंगुलियां डाल दी थीं।
दादी बोली- 'तू चाणक्य की तरह मूर्ख है, अरे गरम खिचड़ी का स्वाद लेना हो तो उसे पहले कोनों से खाया जाता है और तूने मूर्खों की तरह बीच में ही हाथ डाल दिया और अब रो रहा है...।'
दादी बोली- 'तू चाणक्य की तरह मूर्ख है, अरे गरम खिचड़ी का स्वाद लेना हो तो उसे पहले कोनों से खाया जाता है और तूने मूर्खों की तरह बीच में ही हाथ डाल दिया और अब रो रहा है...।'
चाणक्य बाहर निकल आए और बुढ़िया के पांव छूए और बोले- आप सही कहती हैं कि मैं मूर्ख ही था तभी राज्य की राजधानी पर आक्रमण कर दिया और आज हम सबको जान के लाले पड़े हुए हैं।
चाणक्य बाहर निकल आए और बुढ़िया के पांव छूए और बोले- आप सही कहती हैं कि मैं मूर्ख ही था तभी राज्य की राजधानी पर आक्रमण कर दिया और आज हम सबको जान के लाले पड़े हुए हैं।
चाणक्य ने उसके बाद मगध को चारों तरफ से धीरे-धीरे कमजोर करना शुरू किया और एक दिन चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाने में सफल हुए।
by सच्चाई
सर्व धर्म एक समाना
पहले के ज़माने में राजा और उनके मंत्री आधी रात को वेष बदल कर,प्रजा का हालचाल जानने के लिए, रात्रि चर्या के लिए निकल पड़ते थे ।
ऐसे ही एक बार शहनशाह अकबर और चतुर मंत्री बिरबल, वेष बदल कर रात्रि नगर भ्रमण को निकल पड़े ।
सारी रात नगर भ्रमण करते-करते, सुबह होने को आई । अकबर और बिरबल काफ़ी थक गए थे और सुबह भी होने को आई थी । इतने में, उन्होंने नगर के बाहर एक साधु-संत की कुटीर देखी । थोड़ा विश्राम पाने के लिए, दोनों कुटीर के आंगन में, एक बड़े से पेड़ के नीचे बैठ गए । कुछ देर बाद, संत की कुटीर के पास उगे हुए मैया तुलसीजी के पौधे की ओर,बिरबल का ध्यान गया। तुलसीमैया को देखकर, बिरबल उठ खड़ा हुआ और उसके पास जाकर पौधे को श्रद्धा पूर्वक नमन करके उसकी प्रदक्षिणा करने लगा ।
बिरबल की ऐसी क्रियाएं देखकर, अकबर को मज़ाक सुझा उन्होंने अज्ञान जताते हुए बिरबल से पूछा," बिरबल इस सामान्य पौधे को नमन करके तुमने उसकी प्रदक्षिणा क्यों करी?"
बिरबल ने बादशाह को आदर-प्रेम के साथ समझाते हुए कहा,"जहाँपनाह, हमारे धर्म में उस पौधे को तुलसी मैया कहते हैं । हमारे इष्टदेव भगवान श्रीविष्णुजी को तुलसीमाता अति प्रिय हैं, इसलिए हम तुलसीजी को माता का दर्जा देकर उनको वंदन करते हैं, उसकी प्रदक्षिणा करते हैं । आप तो सर्व धर्म समान मानते हैं, अगर आप भी हमारी तुलसीमैया को वंदन करके प्रदक्षिणा करेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा..!!"
पर न जाने क्यों, बादशाह आज बिरबल की मज़ाक उड़ाने के मुड़ में थे अतः, बिरबल की बात अनसुनी सी करके, बिना कुछ कहे, वहाँ से उठकर, अकबर आगे चल दिए ।
अपनी इतनी छोटी सी बात, बादशाह ने न मानी, यह देखकर बिरबल को बहुत बुरा लगा ,इसलिए मौन धारण करके, बिरबल भी अकबर के पिछे-पिछे चल पड़ा । कुछ देर के बाद, बिरबल की नाराज़गी को देखकर, अकबर को शर्म आ गई । बादशाह ने मन में सोचा," मुझे बिरबल के धर्म और आस्था की मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गई ।" यह सोचकर बिरबल की नाराज़गी दूर करने के लिए बिरबल के साथ, बादशाह अन्य विषय पर बातें करने लगे । समय आने पर बादशाह को सबक सिखाने की मन में ठान कर, फिलहाल अपने मन को समझा कर, बिरबल भी, बादशाह के साथ सहज बर्ताव करने लगा । अब तो सूरज भी निकल आया था और नगर में रोज़ की तरह प्रजा की सामान्य चहल पहल भी शुरु हो गई थीं, अतः बादशाह और बिरबल भी नगर में अपने-अपने निवास स्थान की और चलने लगे ।
अचानक रास्ते की एक ओर बिरबल ने, किसी जंगली वनस्पति का एक लता झुंड देखा । देखते ही मानो, बादशाह को `सर्वधर्म समभाव` का सबक सिखाने का एक अच्छा सा मौका बिरबल के हाथ लग गया । झट से बादशाह को थोड़ा सा इंतज़ार करने लिए कहकर, बिरबल ने उस जंगली वनस्पति की प्रदक्षिणा की और बादशाह की ओर अपनी पीठ करके, उस लता झुंड को गले लगा कर, उसके पत्ते को अपने बदन पर मसलने का सिर्फ अभिनय किया ।
बिरबल की ये अजीबो ग़रीब क्रियाएं देखकर,अकबर को मन ही मन हँसी ज़रुर फूटीं पर, उसने हँसी को होठों तक आने नहीं दी । अकबर के चेहरे पर मौन सवाल और आश्चर्य देखकर, बिना पूछे ही बिरबल ने अकबर को बताया," जैसे तुलसीजी, धर्म और आस्था के अनुसार हमारी `माता` है, वैसे ही ये वनस्पति का ये लता झूंड हमारे धर्म अनुसार,`पिता` के समान है..!!"
अब तो अकबर के होठों पर हँसी के साथ सवाल फूट पडा," पर बिरबल, तुमने अपनी तुलसीमैया को सिर्फ नमन किया और यह पिताजी को अपने गले से लगाकर, उनको अपने बदन पर खूब रगड़ा..!! ऐसा क्यों?"
बिरबलने चेहरा गंभीर रखते हुए उत्तर दिया," हमारे धर्म के अनुसार `माता` को देवी स्वरूप मान कर, उनको सिर्फ नमन करने की परंपरा है और पिता को गले लगाकर, हम उनका बदन सहलाते हैं । मगर आप ये सब जानकर क्या करेंगे? मगर आप तो हमारे धर्म-आस्था की मज़ाक का आनंद उठा रहे हैं,आप भी चाहे तो मेरे पिताजी को गले लगा सकते थे..!! खैर, सुबह हो गई है..अब,च..लें?
बादशाह को लगा," बिरबल का कोई भरोसा नहीं ..!! बातों बातों में, भरे दरबार में, वह सब को बता देगा की, मैंने दूसरे धर्म का अपमान किया है? अब तो उसको खुश करने के लिए, बे-मन से ही सही पर, बिरबल ने जो धार्मिक क्रिया अपने पिता के साथ की हैं, मुझे भी उसे दोहराना चाहिए..!!"
अतः, बिरबल को खुश करने के लिए, अकबर उस जंगली वनस्पति के लता झूंड़ के पास गया, उसकी प्रदक्षिणा करके, उसे गले भी लगाया और अपने बदन पर भी खूब रगडा..!!
आप सभी विद्वान साहित्यकार मित्रों को तो पता ही होगा की, `कौंच` को छुने से खुजली होती है..!!
अकबर को सारे बदन में बहुत खुजली होने लगी और साथ में पीड़ा भी..!! अकबर ने बदन को खुजलाते हुए, बिरबल से पूछा," अरे बिरबल तेरा ये कैसा बाप है, तुमने उसे गले लगाया तो तुम्हें कुछ असर न हुआ और मेरे सारे बदन को काट रहा है?"
बादशाह की ऐसी हालत देखकर, बिरबल ने मुस्कुराते हुए कहा," जहाँपनाह, लगता है आपने मेरी तुलसी माता का अपमान किया था उसी बात से नाराज़ और ग़ुस्सा होकर, सज़ा देने के लिए, मेरे पिताजी आपको बहुत काट रहे हैं। आइन्दा से किसी की भी धर्म या फिर आस्था का मज़ाक मत उड़ाना । "
बोध- किसी भी धर्म का मज़ाक नहीं करना चाहिए,
॥ सर्व धर्म एक समानाः ॥
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Wednesday, 20 March 2013
सर्वश्रेष्ठ धर्म
एक राजा हुआ। उसने दूर-दूर खबर कर कि जो भी धर्म श्रेष्ठ होगा, मैं उसे स्वीकार करूंगा। अब तो उसके पास एक से बढ़कर एक विद्वान आने लगे, जो अपने धर्म की श्रेष्ठता का बखान करते हुए दूसरे के धर्म के दोष गिनाते। लेकिन राजा के सामने कुछ सिद्ध न हो पाया कि कौन धर्म चरम धर्म है। कौन सर्वोत्कृष्ट धर्म है? जब यही सिद्ध न हुआ तो राजा अधर्म के जीवन में जीता रहा। उसने कहा, जिस दिन सर्वश्रेष्ठ धर्म उपलब्ध हो जाएगा, उस दिन मैं धर्म का अनुसरण करूँगा। जब तक सर्वश्रेष्ठ धर्म का पता ही नही है, तो मैं कैसे अपना जीवन को छोडू और बदलु? तो जीवन तो वह अधर्म में जीता रहा, लेकिन सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज में पंडितो के विवाद को सुनता रहा। ऐसे ही दलीले सुनते-सुनते राजा का जीवन बीतने लगा।
फिर तो राजा बूढ़ा होने लगा और घबरा गया कि अब क्या होगा? अधर्म का जीवन दुःख देने लगा। लेकिन जब सर्वश्रेष्ठ धर्म ही न मिले, तो वह चले भी कैसे धर्म की रह पर? अंतत: वह एक प्रसिद्ध फकीर के पास गया। राजा ने संत को अपनी परेशानी बताते हुए कहा - मैं सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज में हूं। लेकिन आज तक मुझे वह नहीं मिल सका है। फकीर ने कहा - सर्वश्रेष्ठ धर्म! क्या संसार में बहुत से धर्म होते हैं, जो श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ धर्म की बात उठे, धर्म तो एक है। कोई धर्म अच्छा, कोई धर्म बुरा, यह तो होता ही नहीं। सर्वश्रेष्ठ का सवाल ही नहीं है। राजा बोला, लेकिन मेरे पास तो जितने लोग आए, उन्होंने कहा हमारा धर्म श्रेष्ठ है। उस फकीर ने कहा, जरुर उन्होंने धर्म के नाम से मैं श्रेष्ठ हूँ यही कहा। उनका अहंकार बोल होगा। धर्म तो एक है,अहंकार अनेक है। राजा से उसने कहा, जब भी कोई पथ से बोलता है किसी धर्म से बोलता है, तो समझ लेना, वह धर्म के पक्ष में नही बोल रहा है, अपने पक्ष में बोल रहा है। और जहाँ पक्ष है, जहाँ पथ है, वहाँ धर्म नही होता। धर्म तो वही होता है जहाँ व्यक्ति निष्पक्ष होता है। पक्षपाती मन में धर्म नही हो सकता है।
राजा प्रभावित हुआ।उसने कहा, तो फिर मुझे बताओ, मैं क्या करु? उस फकीर ने कहा- आओ नदी के किनारे चलते हैं वहीं बताऊंगा। नदी पर पहुंच फकीर ने कहा - जो सर्वश्रेष्ठ नाव हो तुम्हारी राजधानी की , तो उसमें बैठ कर उस तरफ चलें। राजा ने कहा यह बिलकुल ठीक है। राजा जाए तो सर्वश्रेष्ठ नाव आनी चाहिए। बीस-पच्चीस जो अच्छी से अच्छी नावें थी, वे बुलाई गई। और वह फकीर भी अजीब था, एक-एक नाव में दोस निकलने लगा कि इसमें यह खराबी है, इसमें यह दाग लगा हुआ है। यह तो आपके बैठने के योग्य नही है। राजा भी थक गया। सुबह से साँझ हो गई। भूखा प्यासा राजा फकीर से बोला - क्या बकवास लगा रखा है, इनमें से तो कोई भी नाव पार करा देगी और अगर नाव पसंद नहीं है, तो खुद ही तैर कर पार कर लें, छोटी सी नदी तो है। फकीर हंसने लगा और बोला - यही तो मैं सुनना चाहता हूं। राजन! धर्म की कोई नाव नहीं होती। धर्म तो तैरकर ही पार करना होता है, खुद। कोई किसी दूसरे को बिठाकर पार नहीं करा सकता।
धर्म की कोई नाव नही होती। और जो कहता हो धर्म की नाव होती है, समझ लेना, धर्म से उसे कोई मतलब नहीं, कोई नाव चलाने वालो का व्यापारी होगा वह, जो नाव चलाने वाले है, उनका व्यपार है उनकी कोई नाव नही है। धर्म तो तैर कर ही पार करना होता है-व्यक्तिगत।
वे जल्दी नदी में उतरे और पर हो गए। वह थोड़ी देर की बात थी, लेकिन नाव की प्रतीक्षा में और अच्छी नाव की खोज में सारा दिन व्यर्थ हुआ था।
उपदेश
एक बार समर्थ स्वामी रामदासजी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगायी - “जय जय रघुवीर समर्थ !” घर से महिला बाहर आयी। उसने उनकी झोलीमे भिक्षा डाली और कहा, “महात्माजी, कोई उपदेश दीजिए !”
स्वामीजी बोले, “आज नहीं, कल दूँगा।”
दूसरे दिन स्वामीजी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी – “जय जय रघुवीर समर्थ !”उस घर की स्त्रीने उस दिन खीर बनायीं थी, जिसमे बादाम-पिस्ते भी डाले थे।वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आयी। स्वामीजीने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, “महाराज ! यह कमंडल तो गन्दा है।”
स्वामीजी बोले, “हाँ, गन्दा तो है, किन्तु खीर इसमें डाल दो।” स्त्री बोली, “नहीं महाराज, तब तो खीर ख़राब हो जायेगी। दीजिये यह कमंडल, में इसे शुद्ध कर लाती हूँ।”
स्वामीजी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ़ हो जायेगा, तभी खीर डालोगी न ?”
स्त्री ने कहा : “जी महाराज !”
स्वामीजी बोले, “मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिन्ताओ का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्करो का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा। यदि उपदेशामृत पान करना है, तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, कुसंस्कारो का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी।"
शुरुआत
दोस्तों ब्लॉग की दुनिया में आप सबका स्वागत है।वैसे तो आप कई जगह प्रेरक प्रसंग, रोचक कहानियाँ, सत्संग की बाते इत्यादिपढ़ी होगी। लेकिन मेरा प्रयास उन सभी कहानियों को एक जगह इकट्ठा करना है जिससे हमें कुछ ज्ञान मिले। हो सकता है आप उन कहानियों को कही पढ़े होंगे लेकिन ज्ञान वर्धक कहनियो को कितना ही पढ़ो लाभदायक ही होगा।
इसी के साथ मैं इस ब्लॉग की शुरुआत करता हु।